बिलासपुर का झुग्गा (जुग्गा) आंदोलन :----- बिलासपुर के इतिहास में झुग्गा या डांडरा प्रकार के आंदोलन होते रहे हैं। डांड़रा भी विरोध करने का एक अन्य तरीका होता था। इसका शाब्दिक अर्थ-'हल्ला-गुल्ला' या 'जन आंदोलन' होता है। इस प्रकार के आंदोलन प्रायः जनता के द्वारा सत्ता के प्रति अपना आक्रोश को प्रकट करने के लिए चलाये जाते थे। अगर सत्ता या राजा के द्वारा आंदलोयंकारियों की मांगों को मान लिया जाता था तो आंदोलन या झुग्गा करने वाले लोग वापिस अपने-अपने घर आ जाते थे। इस आंदोलन का उद्देश्य आत्मोत्पीड़न और आत्मदाह द्वारा राजा और उसके प्रशासन के अत्याचारों, तानाशाही के प्रति विरोध प्रकट करना था। इस आंदोलन में भाग लेने वाले लोग झुग्गा अथवा घास-फूस की झोंपड़ी बनाकर उसमें निश्चित समय तक बैठते थे और न्याय पाने के लिए राजा के आदेश की प्रतीक्षा करते थे। अगर निश्चित अवधि तक उन्हें न्याय नहीं मिलता था तो लोग झुग्गा में आत्मदाह कर लेते थे। उसके पश्चात् गाँव का दूसरा व्यक्ति उसका स्थान ले लेता था। कोट, पंडतेहड़ा, गेहड़वी तथा तल्हवाण में झुग्गा किये जाने के प्रमाण बिलासपुर के इतिहास 'शशिवंश विनोद' में मिलते हैं।
बिलासपुर में यह आंदोलन राजा अमरचंद के शासनकाल में हुआ था। इसके समय में गेहड़वी के ब्राह्मणों में असंतोष फैल गया था, क्योंकि राज्य के कुछ निःसंतान मरने वाले ब्राह्मण परिवारों की 1884 ईस्वी में भूमि राज्य ने अपने अधिकार में ले ली थी। ऐसे परिवारों के निकटतम उत्तराधिकारी राज्य के इस कार्य को अनुचित समझते थे। इस असंतोष को भड़काने में मियाँ काहन सिंह का भी हाथ था। गेहड़वी के अतिरिक्त पंडतेहड़ा और तुल्हण गाँव के ब्राह्मणों ने भी राज्य द्वारा किये गए भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध अपना रोष प्रकट किया।
राजा के द्वारा गेहड़वी गाँव में पुलिस भेज कर झुग्गा में धरने पर बैठे आंदोलनकारियों को गिरफ्तार करने का आदेश दिया जाता है। जब पुलिस के पहुँचने का पता आंदोलनकारियों चलता है तो अपने-अपने झुग्गों में बैठे आंदोलनकारी स्वयं को आग लगा देते हैं। जिस कारण कई आंदोलनकारी शहीद हो जाते हैं। यह सब देख कर एक व्यक्ति गुलाब राम तहसीलदार निरंजन सिंह पर गोली चला देता है। लोगों के द्वारा घायल निरंजन सिंह को जलते हुए झुग्गा में फेंक देते हैं। पुलिस वहां से भागकर बिलासपुर पहुंच जाती है। राजा अमरचंद अंग्रेजों की सहायता से इस विद्रोह को दबा देता है। गुलाब राम को पकड़कर 6 वर्ष कैद की सज़ा देकर सिउनकिले में बन्दी बनाया जाता है। इस आंदोलन का मुख्य नेता मियाँ काहन सिंह था। जो आंदोलनकारी पकड़े जाते हैं उन्हें रतनगढ़ किले में सजा दी जाती है। भूमि बंदोबस्त संबंधी आंदोलन 1930 ईस्वी में बिलासपुर में एक बार फिर से हुआ था। इस आंदोलन को दबाने के लिए लाहौर के रेजिडेंट ने एडवर्ड वेकफील्ड के साथ कुछ सैनिक भेजे थे। अंत में राजा को उनकी बात माननी पड़ती है। इस प्रकार ये दोनों आंदोलन अपने उद्देश्य में सफल रहे।
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