हिमाचल की चित्रकला का इतिहास :---- भारतीय चित्रकला के इतिहास में हिमाचल की चित्रकला के इतिहास का अपना एक विशिष्ट स्थान है। हिमाचल की चित्रकला अपनी विशेषताओं के लिए काफी ख्याति प्राप्त कर चुकी है। हिमाचल की चित्रकला के उदाहरण हमें लघुचित्रों व भित्तिचित्रों के रूप में मिलते हैं। ये लघुचित्र कागजों में बनाये जाते थे और भित्तिचित्र मंदिरों, राजमहलों, बावड़ियों तथा निजी भवनों की दीवारों और छतों को सुशोभित करने के लिए चित्रित किये गए थे। हिमाचल की यह चित्रकला, काँगड़ा की चित्रकला आदि नामों से जानी जाती है। हिमाचल प्रदेश की चित्रकला भी हमारी सभ्यता और संस्कृति की अमूल्य धरोहर है। हिमाचल चित्रकला की कुछ सुन्दर कृतियां 19 वीं और 20 वीं शताब्दी में प्रकाश में आयी।
सर्वप्रथम 19 वीं शताब्दी में मैटकॉफ नामक व्यक्ति ने काँगड़ा में इस शैली के कुछ चित्रों की खोज की। 20 वीं शताब्दी में डॉ. आनंद कुमार स्वामी भी इस और आकृष्ट हुए और उन्होंने 1908-10 ईस्वी के बीच इस विषय को लेकर काफी लेख लिखे तथा भाषण दिए। 1912 ईस्वी में डॉ. आनंद कुमार स्वामी ने राजपूत कला को मुग़ल कला से भिन्न बताया। उन्होंने राजपूत कला को दो भागों पहाड़ी कला ओर राजस्थानी कला में विभक्त किया। उनके अनुसार पहाड़ी कला का क्षेत्र पंजाब की पहाड़ी रियासतें तथा राजस्थानी कला का क्षेत्र राजस्थान का मैदानी क्षेत्र था। 1916 ईस्वी में डॉ. आनंद कुमार स्वामी की पुस्तक "राजपूत पेंटिंग" प्रकाशित हुई। इसमें उन्होंने पहाड़ी कलाकृतियों की सांस्कृतिक भूमिका पर प्रकाश डाला। इससे हिमाचल की कला को मान प्राप्त हुआ और इस चित्रकला को विश्व में गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त हुआ। हिमाचल में चित्रकला का जन्म कैसे हुआ इस संबंध में कुछ विद्वानों के अनुसार पहाड़ी चित्रकला का जन्म जम्मू के पहाड़ी क्षेत्र बसोहली में हुआ। इन विद्वानों के अनुसार सर्वप्रथम मुग़ल दरबार से निष्कासित कलाकारों का एक दल या समूहबसौली पहुंचा और उन्होंने वहां की लोक कला में परिमार्जन करके बसौली शैली का निर्माण किया। इसके बाद इसका विकास अन्य पहाड़ी रियासतों में हुआ। कुछ विद्वानों के अनुसार पहाड़ी कला का जन्म गुलेर में हुआ। 1780 ईस्वी में जब गुलेर शैली अपने पूर्ण निखार में थी तो उसने कांगड़ा में प्रवेश किया और काँगड़ा शैली के नाम से प्रसिद्ध हुई। इस कला शैली को ही पहाड़ी कलम या काँगड़ा कलम भी कहा जाता है।
इतने लम्बे विकास चरण के चलते यह पहाड़ी चित्रकला जम्मू से टिहरी और पठानकोट से कुल्लू तक लगभग 1500 वर्ग मील क्षेत्र में फैली हुई थी। ये पहाड़ी क्षेत्र मैदानी क्षेत्रों की अपेक्षा आर्थिक स्थिति में पिछड़ा होने के बावजूद काफी शांतमय था। मुग़ल बादशाह जहांगीर के समय में कलाकारों की अधिकता के कारण वहां से कुछ कलाकार इस शांतमय वातावरण में पहाड़ी रियासतों में आकर बस गए थे। हिमाचल प्रदेश के प्राकृतिक सौंदर्य का कला निर्माण में विशेष योगदान रहा है। यहाँ के इस मनोहारी शांतमय वातावरण की झलक हिमाचल की चित्रकला में स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है। औपनिवेशक काल में हिमाचल की पहाड़ी रियासतों में बसे कलाकारों का प्रमुख स्थान काँगड़ा बन गया। उन्होंने जिस शैली में चित्रों का चित्रांकन किया, उसे चित्रकला की 'कांगड़ा शैली' या 'पहाड़ी शैली' कहा जाने लगा। कांगड़ा शैली के कलाकारों ने कवियों और नायकों से प्रेरणा लेकर चित्रांकन के विषयों को अत्यंत व्यापक कर दिया। उन्होंने पौराणिक नायकों और देवी-देवताओं की गाथाओं के साथ-साथ लोक गाथाओं और कृषक जीवन के दृश्यों के भी चित्र बनाये। उन्होंने रामलीलाओं को चित्रित कर संगीत और चित्रकला के अटूट संबंधों को प्रदर्शित करने का प्रयास किया। कांगड़ा के राजा संसार चंद्र के शासनकाल में पहाड़ी शैली की बहुत प्रगति हुई और टिहरी-गढ़वाल तथा बुंदेलखंड की रियासतों में इसका विशेष प्रचार हुआ। बंगाल, बिहार और उतर-प्रदेश में जब ब्रिटिश शासनकाल स्थापित हो गया था, तब टिहरी, गढ़वाल, काँगड़ा और इस पहाड़ी क्षेत्र के अन्य नगरों में तथा पंजाब में सिख रियासतों की राजधानियों में काँगड़ा चित्र शैली बड़ी लोकप्रिय थी। इस समय गढ़वाल के चित्रकारों में भोलाराम माणकूस और चैकू ने बड़ा यश प्राप्त किया था। काँगड़ा शैली में बने व्यक्ति चित्र इतने सुन्दर और आकर्षक बनने लगे थे कि 19 वीं शताब्दी में अनेक नगरों में उनकी मांग हो रही थी। पंजाब में महाराजा रणजीत सिंह की राजसभा में भी काँगड़ा शैली के चित्रकार विद्यमान थे। इनमें प्रख्यात चित्रकार कपूरसिंह भी था।
हिमाचल प्रदेश की रियासतों में मुग़ल कलाकारों के आने से वहां लोक शैली मुग़ल प्रभाव से विकसित होकर एक नया रूप धारण करने लगी। यहाँ की कई पहाड़ी रियासतों में कला केंद्र स्थापित हो गए। इन सभी पहाड़ी रियासतों में उस समय छोटे-बड़े कुल 38 कला केंद्र थे। उस समय के प्रमुख कला केंद्र इस प्रकार थे:--- गुलेर, नूरपुर, टिहरा सुजानपुर, नदौन, चम्बा, मंडी, सुकेत, कुल्लू, बिलासपुर, अर्की(बाघल), नाहन, कोटला, जुन्गा तथा जुब्बल। हिमाचल प्रदेश की चित्रकला के इन केंद्रों में जिन शैलियों ने जन्म लिया वे गुलेर शैली आदि नामों से जानी जाने लगीं तथा इन शैलियों में बने चित्र "पहाड़ी चित्रकला" के अंतर्गत आते हैं। इन कला केंद्रों में कलाकारों का एक केंद्र में आना-जाना लगा रहता था। जिससे एक शैली दूसरी शैली को प्रभावित करती रही। राजाओं के समय चित्रकला के क्षेत्र में ऐतिहासिक महत्व का कार्य होकर विकास हुआ है। जिसे क्षेत्रीय विकास के अनुसार गुलेर, काँगड़ा, मंडी, बसौली, कुल्लू,बिलासपुर,चम्बा एवं अन्य शैलियों के नाम से पुकारा जाता है। इन चित्रों को बनाने के लिए कुटीर-उद्योगों में तैयार किये गए कागज का प्रयोग किया गया है, जिसे सियालकोटी कागज कहते हैं। प्रमुख रूप से प्रयोग में लाये गए रंग लाल, पीला, नीला और काला है। 200-300वर्ष बीत जाने पर भी इन रंगों की चमक पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। पहाड़ी चित्रकला के नमूने कांगड़ा के मंदिरों की दीवारों पर बनाये गए चित्रों में देखे जा सकते हैं। चित्रकला का यह रूप स्पीति की ताबो और बौद्धमठों की दीवारों पर भी देखा जा सकता है।
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Nc
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