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हिमाचल की मूर्तिकला का इतिहास और उससे सम्बंधित महत्वपूर्ण तथ्य !!!!

हिमाचल की मूर्तिकला (Sculphire in Himachal):---- 

ancient history of himachal pradesh in hindi

हिमाचल में जहाँ कला के अन्य पहलुओं का विकास हुआ, वहीँ मूर्ति-निर्माण की कला में भी यहाँ के लोग पीछे नहीं रहे हैं। अति प्राचीन काल से लेकर आज तक कई भव्य मूर्तियों का निर्माण किया गया है। इस कला का विकास पाषाण, काष्ठ और धातु की मूर्तियाँ बनाने में हुआ है। जिनके भिन्न रूप देखे जा सकते हैं ---

पाषाण मूर्ति कला:--- इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण काँगड़ा में मसरूर के मंदिर और इनमें पाई जाने वाली पाषाण मूर्तियाँ हैं। इसके अतिरिक्त इस कला के अन्य उदहारण हैं हाटकोटी, निरथ, निरमंड और ममेल(करसोग) के मंदिर और बिलासपुर के गुगा-गेहड़वी आदि के मंदिर।  देवी-देवताओं की पाषाण मूर्तियाँ हिमाचल के प्रायः हर गाँव में मिलेंगी, जो इस क्षेत्र में इस कला की लोकप्रियता का द्योतक है। 

काष्ठ मूर्ति कला:--- यद्यपि लकड़ी की मूर्तियाँ नहीं रखी जाती हैं परन्तु मंदिरों की लकड़ी की मूर्तियाँ दीवारों में बनाकर रामायण, महाभारत या पुराणों की कहानियों के दृश्य दिखाए गये हैं। इसे मंदिर जिनमें लकड़ी की मूर्ति-कला का विकास हुआ है। भरमौर के लक्षणाशक्ति देवी के मंदिर, निरमंड (कुल्लू) में दखणी महादेव, लाहौल में मृकुला देवी, मंडी में मगरू महादेव और शिमला में मानण के मंदिर हैं। 

धातु मूर्ति कला:---- हिमाचल के मध्य और उपरी भाग में प्रायः प्रत्येक गाँव का अपना देवता है जिसकी पीतल, चांदी और सोने की लघु या विशाल आकार की मूर्तियाँ हैं जिनकी बनावट देखते ही बनती है। कई मूर्तियों को देखकर तो ऐसा लगता है जैसे वे आप से बातें कर रहीं हों। इन मूर्तियों का निर्माण अति प्राचीन कला से पिछली शताब्दी तक होता रहा है। निम्न भाग में देवी के मंदिरों में धातु की मूर्तियाँ हैं। इस कला के अनुपम उदहारण जुब्बल के हाटकोटी मंदिर में महिषासुर मर्दिनी, चंबा में लक्षणा देवी, शक्ति देवी, नारसिंह, गणेश, नंदी, विष्णु, लाहौल में मृकुला देवी, कुल्लू में त्रिपुरा-सुंदरी और सराहन में भीमकाली की मूर्तियाँ हैं। 

                              इसके अतिरिक्त मूर्ति निर्माण पहाड़ी जीवन के सांस्कृतिक पहलु से जुड़ा है। विशेष उत्सवों पर गणेश और अन्य देवी-देवताओं की मिट्टी या आटे की मूर्तियाँ बनाई जाती हैं, जिन्हें बाद में पानी बहा दिया जाता है। मिट्टी को कई बार सुरक्षित भी रखा जाता है।
                            हिमाचल की भौगोलिक स्थिति, एतिहासिक परम्परा, धार्मिक विश्वासों, जलवायु की विविधता और लोगों की परिश्रम प्रियता ने कई प्रकार की हस्तकलाओं को जन्म देकर विकसित किया है। जो मिट्टी के बर्तनों, खिलौनों के निर्माण से लेकर संसार भर में प्रचलित उनी वस्त्रों के रूप में देखी जा सकती हैं। हिमाचली लोगों की हस्तकला के नमूने मिट्टी के बर्तनों, पिटक निर्माण, काष्ठ कर्म, धातु कर्म, कपड़ा बुनाई, आदि में देखे जा सकते हैं।
                       हिमाचल के मध्य और उपरी भाग में बनाया जाने वाला प्रसिद्ध बर्तन 'किल्टा' या 'धीरटा' है। यह आमतौर पर नागल या तुंग नामक वास से बनाया जाता है। शंकु-आकार की यह लम्बी टोकरी चश्मे से बर्तनों में पानी ढोने, खेतों में फसल लाने और खेतों में खाद डालने तथा जंगल से घास आदि लाने के प्रयोग में लाई जाती है। इसी हस्तकला से बैलों और पशुओं के मुंह बंद करने के लिए ताकि वे फसल आदि न खाएं, 'छिकडे' या 'छबेडे' भी बनाये जाते हैं। इस काम को करने वाले भी विशेष जाति के सिद्धहस्त होते हैं, जिन्हें 'रेहड़ा' या 'डुमणे' कहा जाता है। 

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