तैमूरलंग और काँगड़ा का इतिहास
1390 ईस्वी में सागर चंद के पश्चात् मेघ चंद गद्दी पर बैठा और 1405 ईस्वी तक शासन किया। 1398 ईस्वी में तैमूर ने भारत पर आक्रमण किया। वह बढ़ता हुआ दिल्ली तक आ पहुंचा। वह पन्द्रह दिन तक दिल्ली में रुका। 1 जनवरी,1399 ईस्वी को उसने दिल्ली से प्रस्थान किया और मेरठ, हरिद्वार तथा सिरमौर की निचली पहाड़ियों से होता हुआ वह वापस लौट गया। तैमुरलंग ने अपनी आत्मकथा "मालफुजत-ए-तिमुरी" में नगरकोट का वर्णन करते हुए लिखा है कि "शिवालिक की घाटी में जब पहुंचा तो मुझे नगकोट के संबंध में खबर दी गयी जो हिंदुस्तान का एक बड़ा और प्रसिद्ध नगर है तथा इन्हीं पहाड़ों में है। इसकी दूरी तीस कोस की थी पर रास्ता वनों तथा ऊंचें पहाड़ों से होकर जाता था। इन पहाड़ों में बसने वाले हर एक राज्य या राजा के पास काफी सैनिक थे। अभी मुझे इन बातों का पता लगा, मेरा हृदय इन विधर्मी हिन्दुओं से लड़ने को और इस इलाके पर विजय प्राप्त करने को उतेजित हो उठा।"
| Taimurlang |
मेघ चंद की मृत्यु के पश्चात् 1405 ईस्वी में काँगड़ा की गद्दी पर हरी चंद बैठा। इसके राज्य काल में एक ऐसी घटना घटी, जिस के कारण काँगड़ा राज्य दो भागों में विभक्त हो गया। एक दिन राजा हरी चंद हरसर(Harsar) जंगल की ओर आखेट के लिए गया। वह आखेट खेलते समय किसी प्रकार अपने साथियों से बिछुड़ कर कुएं में जा गिरा। बहुत खोज की गयी, पर उसका कहीं पता न चला। अंत में उस के परिवार के लोगों ने यह समझकर कि उस की मृत्यु हो गई। उसका श्राद्ध तथा अंत्येष्टि तक कर दिये। उसकी रानियाँ भी सती हो गई। उसका कोई पुत्र नहीं था। अतः राजगद्दी पर उसके छोटे भाई कर्म चंद को बिठा दिया गया, पर हरी चंद मरा नहीं, जीवित था। 22 दिनों के बाद कोई व्यापारी उस रास्ते द्वारा जार रहा था, प्यास से व्याकुल होकर वह कुएं के पास रुका। उसने हरी चंद को कुएं से बाहर निकाल दिया। ऊपर आकर जब पूर्वोक्त बातों का पता चला तो उसने कर्म चंद के हाथों से राज्य छिनने की अपेक्षा यह निश्चय कि वह अब काँगड़ा नहीं लौटेगा। उसने बाण गंगा के किनारे पर एक दुर्ग और नगर हरीपुर का निर्माण किया तथा एक नए राज्य की स्थापना की जो आगे चल कर गुलेर राज्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ। अतः कर्म चंद पैतृक गद्दी पर ही रहा। वह 1415 ईसवीं से 1429-30 ईस्वी तक शासन करता रहा।
कर्म चंद के बाद उसका पुत्र संसार चंद प्रथम 1430 ईस्वी में नगरकोट की गद्दी पर बैठा। उसने 1450 ईस्वी तक शासन किया। उसके बाद 1450 ईस्वी में दिवंग चंद तथा 1465 ईसवी में नरेंद्र चंद गद्दी पर बैठे। इन राजाओं के बारे में कोई विशेष घटना नहीं घटी। 1480 में नरेंद्र चंद की मृत्यु हो गई। उसकी कोई संतान नहीं थी, परन्तु उसकी मृत्यु के समय रानी गर्भवती थी। इन परिस्थितियों में अनेक गद्दी पर दावा करने लगे। रानी डर कर अपने मायके पूना चली गई। रास्ते में एक कुम्हार की झोंपड़ी के घर रानी ने पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम सुवीरा रखा गया। बाद में उसने नाना की सहायता से काँगड़ा पर पुनः अधिकार कर लिया। उसने उस कुम्हार को भी जागीर दी, जिसकी झोंपड़ी में उसका जन्म हुआ था। सुवीरा चंद के बाद 1490 ईस्वी में प्रयाग चंद काँगड़ा का शासक बना, जिसने 1510 ईस्वी तक शासन किया। तत्पश्चात राम चंद 1510 ईस्वी में शासक बना। उसके बाद 1528 में धर्म चंद राजा बना।
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