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पंचायती राज in Hindi


किसी भी लोकतान्त्रिक देशों की सबसे बड़ी चुनौती यही रही है कि कैसे प्रत्येक निर्णय में जनता कि सहभागिता को बड़ाया जाए जिसमें वे अपने विकास का रास्ता खुद तय कर सकें। इसी उदेश्य को बड़ावा देने के लिए सता के विकेन्द्रीकरण कि बात कही जाती है। गाँव में व्याप्त समस्याओं को केवल केंद्रीय स्तर पर बैठकर हल नहीं किया जा सकता बल्कि इन समस्यों को विकेन्द्रीकरण के माध्यम से ही हल किया जा सकता है। जिसका सबसे अच्छा माध्यम ग्रामसभाएँ हो सकती है।


पंचायती राज इन हिंदी,panchayati raj

पंचायती राज का आशय या अर्थ :-----

 पंचायती राज व्यवस्था का हमारे देश में होना ग्रामीण विकास के लिए एक उचित पहल है। क्योंकि इस तरह की व्यवस्था से ही ग्रामीणों के विकास हेतु सही समय पर उचित कदम उठाए जा सकते हैं। पंचायती राज एक दर्शन और विचारधारा है। जिसके होने से आज देश की ग्रामीण व्यवस्था को उसके विकास हेतु एक पहचान मिली है। यह केवल शासन, स्वशासन तक सीमित विचार नहीं है। पंचायती राज प्रत्यक्ष लोकतन्त्र का पर्याय है। यह शासन सता को आम लोगों तक पहुंचाने और उनसे संपर्क करने का एक साधन है। यह ग्रामीण व्यवस्था तथा ग्रामीण लोगों के उत्थान हेतु उठाया गया एक सराहनीय कदम है।

ऐतिहासिक विकास क्रम :------
:: भारत में स्थानीय स्वशासन की व्यवस्था स्थापित करने की अनुशंसा सबसे पहले 1870 में लॉर्ड मेयो ने रखी थी।

:: भारत में स्थानीय स्वशासन का जनक लॉर्ड रिपन को माना जाता है। लॉर्ड रिपन 1880-1884 ईस्वी तक भारत के वायसराय के पद पर रहे। लॉर्ड रिपन ने 1882 ईस्वी में एक प्रस्ताव पारित करके स्थानीय शासन के लिए प्रावधान किए। इसी के शासनकाल के समय भारत में पहली बार स्थानीय शासन बोर्ड की स्थापना हुई। इसलिए इसे स्थानीय शासन के विकास के लिए एक संरचनात्मक उपलब्धि माना गया।

:: भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के समय गांधी जी ने पंचायती राज को अत्यंत लोकप्रिय बना दिया।

:: संविधान सभा में पंचायती राज व्यवस्था का समर्थन प्रसिद्ध गांधीवादी श्रीमण नारायण अग्रवाल ने किया और पंचायती राज को संविधान के निर्देशक तत्वों के भाग में सम्मिलित किया। संविधान में वर्णित अनुछेद-40 इसी से संबंधित है।

:: स्वतंत्र भारत में जे.सी. कुमारप्पा ने गांधीवादी आदर्शों के आधार पर गांधीवादी अर्थव्यवस्था का समर्थन किया।

स्वतंत्र भारत में पंचायती राज का विकास क्रम :---------

:: स्वतंत्र भारत में ग्रामीणों के जीवन स्तर में वृद्धि के लिए 1952 में सामुदायिक विकास कार्यक्रम एवं राष्ट्रीय विस्तार सेवा कार्यक्रम फोर्ड फ़ाउंडेशन (Ford Foundation) की मदद से लागू किया गया।

:: सामुदायिक विकास कार्यक्रम के अंतर्गत ग्रामीण लोगों के विकास के लिए सस्ते बीज और तकनीकी सुविधाएं देने का प्रयत्न किया गया। परंतु इस कार्यक्रम को इतनी सफलता नहीं मिली।

                  इसलिए सामुदायिक विकास कार्यक्रम के बेहतर क्रियान्वयन हेतु या इन कार्यक्रमों की असफलता की जांच करने के लिए भारत सरकार ने 1957 ईस्वी में बलवंत राय मेहता की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया। जिसने 1958 ईस्वी में सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी। इस समिति ने जनतांत्रिक विकेन्द्रीकरण की सिफ़ारिश की जिसे पंचायती राज कहा गया। इस समिति की प्रमुख सिफ़ारिशें इस प्रकार हैं........

: इस समिति ने त्रिस्तरीय पंचायती राज प्रणाली की स्थापना की सिफ़ारिश की----(i) ग्राम पंचायत (ii) पंचायत समिति (iii) ज़िला पंचायत। इस तीनों को एक-दूसरे से अप्रत्यक्ष चुनाव के माध्यम से जोड़ा जाए।

: ग्राम पंचायत का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से तथा पंचायत समिति और जिला पंचायत का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से हो।

: विकास और नियोजन से जुड़े सभी कार्यों को इन संस्थाओं को हस्तांतरित किया जाए।

: पंचायत समिति को कार्यकारी निकाय तथा जिला पंचायत को पर्यवेक्षी, समनवयात्मक तथासलाहकारी निकाय बनाया जाए।

: जिला कलेक्टर को जिला पंचायत का अध्यक्ष बनाया जाए।

         अतः समिति की सिफ़ारिशों को 1958 में स्वीकार कर लिया गया, जिसके तहत सर्वप्रथम

पंचायती राज व्यवस्था का शुभारंम्भ भारत के प्रथम प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू

द्वारा राजस्थान के नागौर जिले से 2 अक्तूबर, 1959 को हुआ।

NOTE :- इसके पश्चात कई राज्यों ने इस प्रणाली का शुभारंम्भ किया: जैसे--- : आंध्र प्रदेश (1959)

: कर्नाटक,तमिलनाडू,असम (1960)  
                                 
: महाराष्ट्र (1962)

: गुजरात (1963)

: पश्चिम बंगाल (1964)

यहाँ यह वर्णनीय है कि सभी राज्यों में पंचायतों के स्तर भिन्न-भिन्न थे।

जनता पार्टी की सरकार के समय पंचायतों का विकास :--------------

जनता पार्टी की सरकार ने अशोक मेहता की अध्यक्षता में 1977 में एक समिति का गठन किया 

जिसने अपनी रिपोर्ट 1978 में सरकार को सौंम्पी। इस समिति की सिफ़ारिशें इस प्रकार है.............

: त्रिस्तरीय प्रणाली को समाप्त कर द्विस्तरीय प्रणाली अपनाई जाए, 15000-20000 की जनसंख्या 

पर मण्डल पंचायत का गठन किया जाए तथा ग्राम पंचायत को समाप्त किया जाए।

: जिले को विकेन्द्रीकरण का प्रथम स्तर माना जाए।

: पंचायती चुनाव राजनीतिक दल के आधार पर होने चाहिए।

: पंचायतों को कर लगाने की शक्ति हो जिससे वितीय संसाधनों को जुटाया जाए।

: न्याय पंचायतों को पंचायतों से अलग रखा जाए जिसका प्रमुख न्यायाधीश हो।

: अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए जनसंख्या के आधार पर सीटों का आरक्षण हो। 
दांतेवाला समिति(1978) :------------------

: इस समिति ने खंड स्तर पर नियोजन की सिफ़ारिश की।

: इस समिति ने गाँव, जनपद एवं राष्ट्रीय स्तर पर नियोजन को अंतरसंबंधित करने पर बल दिया।

जी. वी. के राव समिति (1985-86) :-------------------------

योजना आयोग ने ग्रामीण विकास और गरीबी निवारण कार्यक्रम की समीक्षा के लिए 1985में इस समिति की स्थापना की। इस समिति ने निम्न सिफ़ारिशें प्रस्तुत की जो इस प्रकार हैं.....................

: इस समिति ने विकेन्द्रीकरण की प्रक्रिया में जिला परिषद की सशक्त भूमिका होने की सिफ़ारिश

की, क्योंकि नियोजन एवं विकास कार्य के लिए जिला एक उपयुक्त स्तर है।

: विकास कार्यक्रमों का पर्यवेक्षण, नियोजन, कार्यान्वयन जिला या उसके निचले स्तर की पंचायती

 संस्थाओं द्वारा किया जाना चाहिए।

: जिला विकास आयुक्त के पद का सृजन किया जाए तथा उसे जिले के विकास कार्यों का प्रभारी बनाया जाए।

: राज्य स्तर पर राज्य विकास परिषद, जिला स्तर पर जिला विकास परिषद, मण्डल स्तर पर 

मण्डल पंचायत तथा ग्राम स्तर पर ग्रामसभा की सिफ़ारिश की।

: इस समिति ने वित आयोग के गठन, पंचायतों का कार्यकाल 5 वर्ष और त्रिस्तरीय पंचायतों के गठन का सुझाव दिया।

Note :------ वर्ष 1984 में जिला स्तर के नियोजन से संम्बंधित हनुमंत राव समिति ने भी अपनी 

रिपोर्ट पेश की थी। इस समिति ने मंत्री या जिला कलेक्टर के अधीन जिला नियोजन संगठन की सिफ़ारिश की।

एल. एम. सिंघवी समिति :------------

वर्ष 1986 में राजीव गांधी सरकार द्वारा “रीवाइटलाइजेशन ऑफ पंचायती राज इंस्टीट्यूशन फॉर 

डेमोक्रेसी एण्ड डेवलपमेण्ट” विषय पर एल एम सिंघवी की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया

 गया। इस समिति ने निम्न सिफ़ारिशें सरकार के समक्ष पेश की.............

: पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दिया जाए और संविधान में इसके लिए अलग अध्याय

 को जोड़ा जाए तथा इन संस्थाओं के नियमित चुनाव के लिए संविधान में प्रावधान किया जाए।

: कई गाँव को मिलाकर न्याय पंचायतों का गठन किया जाए।

: पंचायतों के लिए कई गांवों का पुनर्गठन किया जाए।

: पंचायतों को वितीय संसाधन उपलब्ध कराये जाएँ।

: पंचायतों से जुड़े मामलों को हल करने के लिए राज्य में न्यायिक अधिकरण की स्थापना की जाए।

पी. के. थुंगन समिति :-------------------

थुंगन समिति ने पंचायती राज को संवैधानिक आधार देने का समर्थन किया था। इस समिति का

गठन 1989 में पंचायती राज संस्थाओं पर विचार करने के लिए किया गया था। परंतु थुंगन समिति

 की सिफ़ारिशों के अनुसार पंचायतों का संबंध सीधा संघ सरकार से होना चाहिए।

                  यहाँ यह उलेखनीय है की सरकारिया आयोग ने भी पंचायती राज संस्थाओं को शक्तिशाली बनाने पर बल दिया था।

सरकारों द्वारा पंचायती राज लागू करने के लिए किए गए प्रयास या संवैधानिक विकास :--------------------------

: वर्ष 1989 में राजीव गांधी सरकार ने पंचायतों को संवैधानिक दर्जा दिये जाने के लिए 64वां 

संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत किया था जो लोकसभा में तो पारित हो गया था 

परंतु राज्यसभा में पारित न हो सका। इसका कारण यह था की लोकसभा को कुछ समय के बाद
 भंग कर दिया गया था।

: वर्ष 1989 में सता परिवर्तन के बाद वी. पी. सिंह सरकार ने भी पंचायतों को सुदृढ़ बनाने के लिए

 प्रयास किया। जिसके तहत 1990 में मुख्यमंत्रियों का एक सम्मेलन आयोजित किया गया तथा 

1990 में ही सरकार ने पंचायती राज से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत किया गया। लेकिन सरकार गिर जाने से यह विधेयक संवैधानिक रूप न ले सका।

: वर्ष 1991 में नई सरकार के गठन के बाद इन संस्थाओं को पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार द्वारा

संवैधानिक दर्जा दिये जाने का प्रयास किया गया और 1991 में इस विधेयक को लोकसभा में 

प्रस्तुत किया गया जिसे लोकसभा द्वारा 22 दिसम्बर, 1991 को तथा राज्यसभा द्वारा 23 

दिसम्बर, 1991 को मंजूरी मिली और बाद में 17 राज्यों के अनुमोदन के साथ राष्ट्रपति द्वारा 20 अप्रैल, 1993 को अपनी सहमति दे दी गयी। तथा इस अधिनियम ने 73वां संविधान संशोधन

 अधिनियम, 1992 का रूप लिया और 24 अप्रैल, 1993 से यह देश में प्रभावी हो गया।

Note :--- इस अधिनियम के प्रभावी होने के बाद सबसे पहले मध्य प्रदेश राज्य में चुनाव हुए।  

 73वां संविधान संशोधन अधिनियम (1992) के प्रावधान :-------

इस संशोधन अधिनियम के तहत संविधान में भाग 9 का उपबंध किया गया है। पंचायत के लिए अनुछेद 243 से अनुछेद 243(O) तक कई प्रावधान किए गए हैं। इनको सुदृड्ता प्रदान करने किए लिए संविधान में 11वीं अनुसूची को जोड़ा गया है, जिसमें पंचायतों से संबंधित 29 विषयों का वर्णन किया गया है।
                  इस अधिनियम के प्रभावी होने के पश्चात संविधान में वर्णित अनुछेद 40 को व्यावहारिक रूप मिला है। इस अधिनियम ने राज्यों को कानून बनाने के लिए मार्गदर्शक का कार्य किया है। जम्मू-कश्मीर, दिल्ली, अरुणाचल प्रदेश, ने ऐसी विधि नहीं बनाई है। यह कानून नागालैंड, मेघालय, मिज़ोरम में जंजातीय परिषद जैसी संस्था होने के कारण प्रभावी नहीं हो पाया है। इस संशोधन अधिनियम के प्रावधान इस प्रकार हैं......................

: इस संशोधन अधिनियम के अंतर्गत संविधान के अनुछेद 243(A) में ग्रामसभा का प्रावधान किया गया है। जो 200 या उससे अधिक सदस्यों से मिलकर बनती है। इसमें गाँव की मतदाता सूची में पंजीकृत सभी मतदाता ग्रामसभा के सदस्य होते हैं। ग्राम सभा की बैठक वर्ष में कम-से-कम दो बार होनी आवश्यक है, तथा कुछ विशेष परिस्थिति में भी बैठक बुलाई जा सकती है।

: इस अधिनियम के अंतर्गत संविधान के अनुछेद 243(B) में पंचायतों के गठन के ग्राम स्तर, मध्यवर्ती तथा जिला स्तर के प्रावधान करता है। जिन राज्यों की जनसंख्या 20 लाख से कम है वहाँ मध्य स्तर की पंचायत का गठन नहीं किया जाएगा।

: इस अधिनियम के अंतर्गत संविधान के अनुछेद 243(C) के अनुसार ग्राम पंचायत के अध्यक्ष का चुनाव ग्रामसभा में पंजीकृत मतदाता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से होता है, तथा मध्यवर्ती पंचायत व जिला पंचायत के अध्यक्षों का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से पंचायतों द्वारा चुने गए सदस्यों से होता है।
नोट:---- पंचायत के अध्यक्ष, सांसद, विधायक को पंचायतों के अधिवेशन में मत देने का अधिकार होता है।

: इसके अंतर्गत संविधान के अनुछेद 243(D) के अनुसार प्रत्येक पंचायतों में अनुसूचित जातियों या जनजातियों के लिए स्थान आरक्षित होंगे जो उनकी जनसंख्या के अनुपात में होगा तथा ये स्थान चक्रानुक्रम के आधार पर आबंटित होंगे। इसी तरह 1/3 स्थान अनुसूचित जातियों या जनजातियों की महिलाओं के लिए आरक्षित होंगे।

: इस अधिनियम के अंतर्गत संविधान के अनुछेद 243(E) में पंचायतों के कार्यकाल की अवधि निर्धारित की गयी है। प्रत्येक पंचायत अपनी प्रथम बैठक की तारीख से 5 वर्ष तक रहेगी तथा उसे समय से पहले भी भंग किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में चुनाव छः माह के अंदर कराने अनिवार्य होंगे, अगर ग्रामसभा निर्धारित समय से पूर्व भंग होती है। यदि कार्यकाल 6 माह से अधिक हो तो शेष बचे कार्यकाल के लिए चुनाव कराये जाएंगे और यदि कार्यकाल 6 माह से कम बचा हो तो चुनाव नहीं कराये जा सकते हैं।

: इसके अंतर्गत संविधान के अनुछेद 243(I) के तहत राज्य का राज्यपाल प्रत्येक 5 वर्ष की अवधि पर पंचायतों की वित्तीय स्थिति के पुनर्विलोकन करने के लिए एक वित आयोग का गठन करेगा जो राज्यपाल को अपनी सिफ़ारिश देगा। यह आयोग राज्य द्वारा लगाए गए कर, पथकरों व शुल्कों का पंचायत और राज्यों के मध्य वितरण, पंचायतों को सौंपे जाने वाले कर के बारे में तथा अन्य ऐसे विषय जो राज्यपाल निर्धारित करे आदि के बारे में अपनी रिपोर्ट देगा।

: इसके अतिरिक्त पंचायतों के लिए कराये जाने वाले चुनाव के लिए एक राज्य निर्वाचन आयोग होगा जिसकी नियुक्ति राज्यपाल के द्वारा की जाएगी।

: 73वें संविधान संशोधन अधिनियम के लागू होने की तारीख (24 अप्रैल, 1993) से एक वर्ष के अंदर सभी राज्यों को नई पंचायती राज प्रणाली को अपनाना होगा तथा पहले से गठित पंचायतें अपने कार्यकाल की समाप्ती तक रहेंगी, अगर राज्य द्वारा उन्हें भंग न किया जाए।

: इसके अंतर्गत प्रत्येक ग्राम पंचायत के लिए एक कोष होता है, जो पंचायत के आय-व्यय का लेखा होता है। जिसे ग्राम पंचायत निधि कोष कहा जाता है। इसका संचालन ग्राम प्रधान तथा पंचायत विकास अधिकारी के माध्यम से होता है।

: इसके अतिरिक्त जिला परिषद् पंचायती राज व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है जो अपने अधीन कार्य करने वाली पंचायती संस्थाओं तथा राज्य सरकार के मध्य एक कड़ी होती है।





  

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